सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

नारियल का पेड और मेरा जीवन संघर्ष

संघर्ष भरे इस जीवन से हारने वाली मैं नहीं...
सागर मुझे डुबो सके वो किनारा मैं नहीं...
मैं उजालों से भर दूंगी अंधकार मय हर पथ को...
जो जगमगाकर टूट जाये वो सितारा मैं नहीं...


कितना कुछ बिखरा होता है हमारे आसपास.... हम जिन घटनाओं, विचारों, अनुभवों को आम और साधारण मानकर खारिज कर देते हैं, वही हमें जिंदगी के अंदाज सिखाती है। कहते है जीवन के कई रंग होते है। जिंदगी किसी के लिए रंगीन बुलबुलों का मेला है, तो किसी के लिए पाठशाला, तो किसी ने जिंदगी को अनसुलझी पहेली मान ली। लेकिन मैं जिंदगी को यात्रा मानती हूं... सिर्फ यात्रा नहीं अपितु यह जीवन मेरे संघर्षो की ‘विजय यात्रा’ है।
संपूर्ण जीवन संघर्षों से भरा पडा है। संघर्षों के पथ पर चलते हुए नई जमीन तोडने वाले का आत्मविश्वास अपनी कहानी खुद बयां करता है। मुझे मंजिल की परवाह नहीं, मेरे लिए तो यही पर्याप्त है कि मैं संघर्ष पथ की अनुगामी हूं।
कहा जाता है कि मनुष्य के पैदा होते ही जीवन संघर्ष का सिलसिला शुरु होता है जो उसकी चिता जलने के बाद ही समाप्त होता है। कभी-कभार ऐसा भी होता है कि मनुष्य संघर्ष में जन्म लेता है, संघर्ष में बडा होता है और अंत में संघर्ष करते-करते ही संसार से अलविदा हो जाता है। इसमें भी अफसोस की कोई बात नहीं। जीवन है ही संघर्ष के लिए। मेरे लिए जीत-हार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है उसके लिए किया गया संघर्ष। सफलता-असफलता, जय-पराजय तो क्षणिक होती है लेकिन उसके लिए किया गया संघर्ष स्थायी होता है। जो संघर्ष से जूझता है एक दिन वही ‘विजय श्री’ का वरण करता है।
बात बहुत पुरानी है। ११ साल बीत चुके है। तब मैं कर्णाटक गई थी। वहां अचानक मेरी नजर नारियल के पेड पर गई। उसके निमंत्रण में मेरी हस्तरेखाओं का खुलापन था। हवा मुझे बिना कागज का खत भेज रही थी। उस खत में इस नारियल के पेड की जड का जिक्र था....
नारियल का पेड...!!! क्या आप इसकी संघर्ष यात्रा को जानते हो?... यह पेड समंदर किनारे होता है। इसकी जडें ६० से ७० फीट जमीन के नीचे से पानी को एकत्रित कर उसे अपने शिखर तक पहुंचाता है... और इसी कारण संघर्ष से सिध्धि तक की इसकी यात्रा को श्रीफल प्राप्त होता है।
जब कभी मुझे गहन सघन अंधेरे घेरते है, मेरा मनोबल क्षीण-क्षीण हो जाता है, अपना खोया हुआ दृढ विश्वास नहीं खोज पाती, तब कही से सहसा यह नारियल का पेड, जिससे मेरा अटूट नाता है, मुझे प्रेरणा देता रहता है कि उठो, संघर्ष करो। तब जाना... कि मैं एकांत में समग्र ब्रह्मांड को एकत्रित कर सकती हूं। पहाड की तरह समाधि लगा सकती हूं। हर पथ में बाधाएं तो आती ही है। लेकिन इन सब को मैं हिम्मत से पार करुंगी। जो लोग जीवन यात्रा के दौरान रुक जाते है उन्हें सिर्फ अंधेरा ही मिलता है। मेरी इस ‘विजय यात्रा’ में मैं अपनी अभिव्यक्ति, अनुभव और अपने सोच को प्रस्तुत करना चाहती हूं। जड से पेड के शिखर तक जो कुछ भी है वह सब आप तक पहुंचाने की समर्पण भावना से।

ये मेरे इरादों की जीत है
ये मेरे संघर्षों की जीत है


शुक्रिया उस राह का जिस पर चलते हुए जिंदगी ने इस पेड से संघर्ष करना सीखा.. शुक्रिया इस यात्रा को..........
साल दर साल गुजरते है लेकिन यह जिंदगी कभी खत्म नहीं होती। जिंदगी तो हर साल नये विषय लेकर शुरु होती है।
फिर मिलेंगे...

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